कुछ दिनों पहले ही मेने भागवद कथा सुनी थी यूट्यूब पर. उसमे एक प्रसंग है – गोपी और उद्धव संवाद | बहुत ही अच्छा प्रसंग है. उस प्रसंग का वो पार्ट जो मेरे इस ब्लॉग का कारन बना, उसे में कुछ शब्दो में बताता हु.
एक बार श्री कृष्ण को वृन्दावन की बहुत याद आने लगती है, और वो फूट फूट कर रोने लगते है.
उद्धव: प्रभु, आप रो रहे है!! आप तो रोना – धोना, दुःख – सुख इन सब से परे है | आप ! क्यों रो रहे है?
श्री कृष्ण: आज वृन्दावन की बहुत याद आ रही है| यशोदा मैया की बहुत याद आ रही है। नंदबाबा की बहुत याद आती है। जब तक में वहा रहा मेने उन्हें एक भी सुख नहीं दिया | तब भी उनका प्रेम घटने की बजाय और बढ़ता गया | गोपियों की विरह वेदना का तो कहना ही क्या |
उद्धव: प्रभु, तो आप उन्हें ज्ञान से समझा सकते थे |
Note: PFB the Link of गोपी और उद्धव संवाद by JayaKishori Ji. https://youtu.be/ft_S-EzNmgQ
उपर्युक्त संवाद से हम इस नतीजे पर पहुंच सकते है की प्रेम >> ज्ञान.
इससे ही मुझे एक क़िस्सा याद आ गया जो इस नतीजे को सत्यापित करता है. में वो आप लोगो के साथ साझा करना चाहता हु और साथ ही साथ में ये भी अपेक्षा करता हु की अगर आप भी सहमत है और कोई क़िस्सा है आपके पास तो जरूर साझा करे.
तो फिर शुरू करे …….
बचपन में हम सबने गणित के कुछ बुनियादी सूत्र पढ़े होंगे, जैसे की माध्य, मध्यिका और बहुलक (Mean,Median and Mode). फिर हमने पढ़ा था भारित औसत (weighted average).
भौतिक विज्ञान में हमने पढ़ा था विशिष्ट गुरुत्व (specific gravity) निकालने का तरीका. ये भौतिक विज्ञान के बुनियादी सूत्रों में से एक है|
इन बुनियादी सूत्रों को आप भूलते नहीं है, क्युकी इनका हम बार बार प्रयोग करते रहते है|
एक बार मेने इन्ही बुनियादी सूत्रों को लेकर एक प्रक्रिया बनाई. ये पक्रिया नयी नहीं थी बस कुछ परिवर्तन किये थे.
अब ऑफिस में ऐसा होता है न की अगर कुछ परिवर्तन करवाना हो किसी पहले से चली आ रही प्रक्रिया में तो बॉस को मनाना,समझाना, बताना पड़ता है.
आगे बढ़ने से पहले एक बहुत जरुरी सुचना :
लगभग हर मनुष्य को परिवर्तन से नफरत होती है खासकर के ऑफिस में मैनेजमेंट वाले लोगो को | पहली बार में परिवर्तन का हर कोई विरोध करता है |
भौतिक विज्ञान में आप लोगो ने पढ़ा होगा लेंज़ का नियम i.e “प्रेरित धारा की दिशा सदा ऐसी होती है जो उस कारण का विरोध करती है जिससे वह स्वयं उत्पन्न होती है।” इसी तरह Human Lenz Law के तहत इंसान परिवर्तन का विरोध करता है.
में भी बताने गया अपने बॉस के बॉस को.
पहले तो उन्होंने पुछा की कुछ नयी प्रकिया के बारे में बात करनी है या या किसी चली आ रही प्रकिया में परिवर्तन चाहते हो. जैसे ही मेने बोला परिवर्तन तो Human Lenz Law ने अपना कमाल दिखाया और सीनियर बॉस ने इस परिवर्तन पर चर्चा करने से मना कर दिया | मेरे बार बार अनुरोध करने से वो किसी प्रकार चर्चा करने के लिए मान गए.
जैसे ही मेने उन्हें बताना/समझाना शुरू किया, उन्होंने ऊँची आवाज में मुझसे बोला की बताओ ये (विशिष्ट गुरुत्व) कैसे निकाला है | बस उनका ऊँची और अलग लहजे में ये पूछना हुआ और इधर मेरा ब्रेन हैंग मोड में चला गया. में उन्हें वो नहीं बता पाया जो हम सब लोग बचपन से पढ़ते आ रहे है.
मेरी आवाज मानो ऐसी हो गयी थी जैसी घंटो रोने के बाद हो जाती है. मेने सहमी हुई आवाज में उनके जवाबो का उत्तर देने की कोशिश की पर असफल रहा.
ऐसा क्यों हुआ?
ज्ञान तो पूरा था | कमी थी तो बस प्रेम की |
can we infer from above two stories that प्रेम >> ज्ञान ???

बढ़ियाँ, अच्छा लिखा है। जहाँ तक प्रेम >> ज्ञान का प्रश्न है तो मैं इसपर अपने विचार रखना चाहूँगा। मैंने ये कथाएं बचपन में कई कई और कई अलग लोगों से सुनी है। सबसे पहले तो यह कहूँगा कि इन कथाओं के एक ही अर्थ नहीं होते, अलग अलग लोग अलग अलग अर्थ निकालते हैं और सब अर्थ अपनी अपनी जगह सही भी होते हैं। मेरी जो इस प्रसंग की समझ है उसके अनुसार गोपियाँ उद्धव को प्रेम के साथ साथ ज्ञान भी बताती हैं और जब उद्धव वापस कृष्ण के पास जाते हैं तो कृष्ण कहते है की तुममें ज्ञान तो है लेकिन प्रेम की कमी थी इसीलिए तुम्हें गोपियों के पास भेजा। प्रेम और ज्ञान के बारे में जो मैंने सीखा है वह यह है की प्रेम और ज्ञान एक दूरसे से तुलना करने के लिए नहीं है बल्कि एक दूरसे का साथ देने के लिए है। कहा गया है कि ज्ञान बिन भक्ति अंधी होती है और प्रेम बिन ज्ञान पंगु होता है। अर्थात अगर ज्ञान न हो तो भक्ति अन्धविश्वाश का रूप ले लेती है और अगर भक्ति न हो तो ज्ञान नीरस और बोझ लगता है। ज्ञान और भक्ति दोनों ही पराम् सत्य तक पहुँचाने के मार्ग हैं, अगर दोनों का साथ हो तो बिना भटके शीघ्र की परम् सत्य तक पहुँचा जा सकता है।
जहाँ तक तुम्हारे और तुम्हारे बॉस के संवाद की बात है तो इसमें प्रेम का कोई काम है ही नहीं। जब भी हम प्रेम और ज्ञान की बात करते हैं तो हम हमेशा यह कहते हैं कि हमें ज्ञान और प्रेम के पथ पर चलना है, दूसरे को चलना चाहिए या नहीं इसकी बात नहीं करते। इसलिए तुम्हारा यह मानना कि तुम्हारे बॉस के मन में प्रेम होना चाहिए ये गलत है। इस संवाद से मैं बस यही समझ पाया कि तुमने अपने बॉस के व्यक्तित्व को समझते हुए सही तैयारी नहीं की थी और इसीलिए अपना उद्देश्य न पा सके।
LikeLiked by 1 person
Mene ye kataha ek hi source se suni, par is baat se sehmat hu m ki katha ke ek hi arth nahi hote. Ye bhi sahi hai ki udhav ko bhejne ke piche shri krishna ka unhe prem avgad karana tha. Jab m likh raha tha tab bhi mere man me ye khayal aaya tha ki prem Or gyan ko ek taraju m tolne ka koi tuk nahi. Tola unhe hi jaata hai jo dono same measure category ke ho. Par agar keh diya jaaye ki kya jyadda jaruri hai to mujhe lagta prem hi jeetega.
Boss se conversation me prem ka kuch kaam hi nahi hai: is sentence se me bilkul agree nahi karta. Prem se har kaam aasan ho jaata. Or wahi uchi aawaj se har kaam mushkil. Ye to har jagah laagu hota hai office ho ya ghar.
LikeLike
Mai phir kahunga ki prem aur gyan ek doosre ko compliment karte hai, inka comparison nahi hona chahiye. Lekin agar phir bhi prem aur gyan me se ek chunana hoga to gyan ko chunana chahiye kyuki bina gyan ke prem andhvishwas ban jata hai jisase path bhatakne ki sambhavna bahut hi adhik badh jati hai. Bin prem ke gyan me kam se kam vyakti marg nahi bhatakta hai. Gopiyan sirf premi nahi thi ve param gyani bhi thi.
Jaha tak boss ke attitude ka prashna hai mai kahunga ki kisi aur se kuch bhi expect karna murkhta hai. Vyakti ko har parastithi ke liye svyam ko tyaar karna chahiye naki ye aasha karni chahiye ki parastithi anukol ho. Agar boss ne anger dekhya tha to avashyak ye tha ki tum apne man mei prem banaye rakhte aur politely answer karte naki dar jate. Tum kisi aur ke vyaktitva ko nahi badal sakte, tum apne vyaktitva ko nikhar sakte ho.
LikeLiked by 1 person